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Saturday, January 27, 2024

कल्याण में सजी कवियों की महफिल


 भजन गीत 'मंदिर बना अभिराम' की हुई लांचिंग

कल्याण। स्व. एम.जे. पंडित चैरिटेबल ट्रस्ट एवं ओम शिवम सत्संग ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में गणतंत्र दिवस पर काव्य गोष्ठी नसिस्त और भजन गीत 'मंदिर बना अभिराम' की लांचिंग यशोदा हॉल, जोशीबाग कल्याण प. में किया गया।
इस मौके पर अग्रवाल और सोनावणे कॉलेज के संस्थापक एवं जनरल सेक्रेटरी डॉ. विजय पंडित ने कहा कि वर्तमान में महाराष्ट्र में एक विकट संकट बहुत नजदीक आता दिख रहा है। एक तरफ मराठा और दूसरी तरफ ओबीसी आरक्षण की बात चल रही है। हम तो ईश्वर से प्रार्थना करेंगे कि जल्द ही कोई रास्ता निकले और हमारा समाज विभाजित न हो। उन्होंने चंद पंक्तियां सुनाते हुए कहा कि जो कहनी थी बात अक्सर वही बात भूल जाता हूँ, किसी की झील जैसी आंखों में अक्सर डूब जाता हूँ, शिकायत है सबसे है पर किसी से कह नहीं सकता, बहुत गुस्सा आता है तो खुद से रुठ जाता हूँ... इन पंक्तियों को पेश करते ही कवियों की महफिल में चार चांद लग गया। और तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हाल गूंज उठा। इस समय अन्य कवियों ने भी अपनी स्वरचित रचनाएं प्रस्तुत कर खूब वाहवाही लूटी। इस मौके पर अग्रवाल कॉलेज के उप प्राचार्य डॉ. राज बहादुर सिंह, सोनावणे कॉलेज के ट्रस्टी श्रीचंद केसवानी, सुनील कुकरेजा का यथोचित सम्मान किया गया। कार्यक्रम के संयोजक रिटेल ग्रेन मर्चेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष हृदय पंडित, सरयूपारीण ब्राह्मण मंच फाउंडेशन के ट्रस्टी अमित तिवारी, दर्शन तिवारी, विजय त्रिपाठी रहे। इस मौके पर वरिष्ठों के हाथों से भजन गीत मंदिर बना अभिराम की लांचिंग की गई। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शर्मा, जगन्नाथ तिवारी, एच पी तिवारी, अंकित जायसवाल, विनीत तिवारी सहित बड़ी संख्या में कविता प्रेमी उपस्थित थे।
संचालन अग्रवाल कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. मनीष मिश्र ने किया।
देश के 75 वें प्रजासत्ताक दिन निमित्त 26 जनवरी के दिन आयोजित इस कार्यक्रम में ओमप्रकाश पांडेय "नमन", मुरलीधर तिवारी,वरिष्ठ पत्रकार राकेश पांडेय (नवभारत) आदि मान्यवर मंच पर विराजमान थे।
काव्य गोष्ठी - नसिस्त का सूत्र संचालन डॉ मनीष मिश्रा ने किया।
कवि अफसर दकनी,उमेश शर्मा,बिलाल रौनक,राज बुंदेली,मनोज उरई,सत्यभामा सिंह,रामस्वरूप साहू,रईस आजमी,नमन,विजय पंडित,मनीष मिश्रा आदि मान्यवरों ने काव्य पाठ किया।

मराठा सामाज की सभी मांगे की गयी पूरी


 

मैने अपने वचन का पालन किया - मुख्यमंत्री 

मराठा सामाज की सभी मांगे की गयी पूरी 

नवी मुंबई। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने मनोज जारांगे को जूस पिलाकर उनका अनशन खत्म करा दिया. इसके बाद मुख्यमंत्री ने मनोज जारांगे पाटिल की तारीफ करते हुए अपनी भावनाएं व्यक्त कीं. मुख्यमंत्री ने कहा कि मुझे गरीब समाज के दुख-दर्द का भी अंदाजा है।' इसलिए मैंने सार्वजनिक रूप से छत्रपति शिवाजी महाराज की शपथ ली थी , उस शपथ को पूरा करने का काम किया जा रहा है . एकनाथ शिंदे ने कहा कि अपनी बात रखना मेरे काम करने का तरीका है. उन्होंने कहा कि मनोज जारांगे पाटिल की तीन मांगें थीं कि जिन परिवारों के 54 लाख रिकॉर्ड मिले हैं, उन्हें प्रमाण पत्र दिया जाए, जिन परिवारों के रिकॉर्ड पाए गए हैं, उन्हें तत्काल आरक्षण दिया जाए और तीसरी मांग थी जिनके रिकॉर्ड पाए गए हैं, उनके रिश्तेदारों को प्रमाण पत्र दिया जाए। उन मांगों को मान लिया गया है . मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे खुद गजट लेकर नवी मुंबई में मनोज जारांगे से मिले और उन्हें सबके सामने गजट की प्रति दी। 

मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने क्या कहा?
मुख्यमंत्री ने कहा कि मैं मराठा समुदाय के लिए लड़ने वाले मनोज जारांगे पाटिल को बधाई देता हूं। न केवल राज्य बल्कि पूरे देश का ध्यान मराठा आंदोलन को देख रहा था । मराठा समाज ने संयमित और अनुशासित तरीके से विरोध किया।' कहीं भी हंगामा किए बिना आंदोलन को सफल बनाने के लिए भी बधाई देते हैं। उन्होंने इस बात का ख्याल रखा कि उनके आंदोलन से किसी को परेशानी न हो. मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि मैं भी एक किसान परिवार का किसान बेटा हूं। मुझे गरीब समाज के दुख-दर्द का भी अंदाजा है।' इसलिए मैंने सार्वजनिक रूप से छत्रपति शिवाजी महाराज की शपथ ली। उस शपथ को पूरा करने का काम एकनाथ शिंदे कर रहे हैं। 

दोनों गुरुओं का आशीर्वाद मेरे साथ रहे
मुख्यमंत्री ने कहा कि आज धर्मवीर आनंद दिघे की जयंती है. हाल ही में बाला साहेब ठाकरे की जयंती हुई. इन दोनों गुरुओं का आशीर्वाद मेरे साथ है। यह ऐतिहासिक लड़ाई आज स्वर्गीय अन्नासाहेब पाटिल की भूमि पर सफल हुई। मैं उन्हें भी सलाम करता हूं. उन्होने कहा कि हमारी सरकार आपकी सरकार है. हमारी सरकार किसानों और मजदूरों की सरकार है. हमने कभी भी वोटों के लिए नहीं बल्कि हित के लिए फैसले लिए। उन्होंने कहा कि मराठों ने कई लोगों को खड़ा किया, कईयों को बड़े-बड़े पद मिले। लेकिन जब मराठा समाज के साथ न्याय नहीं किया गया । मुख्यमंत्री ने कहा कि आज आपकी जीत का दिन है। 

सरकार द्वारा लिए गए निर्णयों में कुनबी प्रमाण पत्र जारी करने के लिए शिंदे समिति की समय सीमा बढ़ाना, प्रमाण पत्र जारी करने के लिए शिविर आयोजित करने की अधिसूचना, रिकॉर्ड खोजने के लिए समिति के अलावा पिछड़ा वर्ग आयोग के माध्यम से कुनबी प्रमाण पत्र जारी करना शामिल है। उन्होंने कहा कि सभी काम कानून के दायरे में किए जायेंगे इससे ओबीसी समुदाय के साथ कोई अन्याय नहीं होगा, मराठा आरक्षण, ओबीसी को जो लाभ आरक्षण से मिलता है वही सब मराठा समाज को भी मिलेगा। 

मुख्यमंत्री का विरोध खत्म : मनोज जारांगे
मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने अच्छा काम किया है. उनसे आपका विरोध ख़त्म हो गया है. आपका अनुरोध स्वीकार कर लिया गया है. जिन्होंने हमारा विरोध किया, हमने उनका विरोध किया. एक समाज के रूप में हमारा विषय ख़त्म हो गया है. मैं मुख्यमंत्री से जूस ग्रहण करूंगा. हम उनका पत्र स्वीकार करेंगे. मैंने समाज को अपना पिता माना है।' मैंने आपसे पूछने का फैसला किया है. क्या हम मुख्यमंत्री को बुलाएं? जैसा कि सभी लोग इस पर सहमत थे, मैंने फैसला किया है।.मैं एक बड़ी विजय रैली करना चाहता हूं.' जारांगे ने कहा कि रैली के संदर्भ में जल्द ही तारीख की घोषणा की जाएगी.

Friday, January 26, 2024

मराठा आंदोलन से बढ़ी सरकार की मुश्किलें

 मराठा आंदोलन से बढ़ी  सरकार की मुश्किलें 

मनीष अस्थाना 
मराठा आंदोलन की आग एक बार फिर तेज होने लगी है , मराठा आंदोलनकारी धीरे धीरे मुंबई की तरफ बढ़ रहे हैं जैसे जैसे आंदोलन कारी मुंबई की तरफ बढ़ रहें हैं वैसे वैसे सरकार की धड़कन भी तेज होती जा रही है। मार्च या अप्रैल में लोकसभा चुनाव होने की बात कही जा रही है , महाराष्ट्र में महायुति ने लोकसभा की 48 में 45 सीटें जीतने का बीड़ा उठाया हुआ है। भाजपा के आला नेताओं को महाराष्ट्र के भाजपा नेताओं समेत शिवसेना के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे तथा एनसीपी नेता अजीत पवार ने भी इस बात का भरोसा दिलाया है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में लोकसभा की 45 सीटें जिताने में वे भी पीछे नहीं रहेंगे। किंतु जिस तरह से महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन की आग भड़क रही है ऐसे में भाजपा तथा उसके सहयोगी दलों के लिए आधी सीटें जीत पाना भी मुश्किल दिखाई दे रहा है। हालांकि अभी तक जितने भी सीटों को लेकर सर्वेक्षण किए गए हैं या फिर किए जा रहें हैं उसमें भी भाजपा के नेताओं की चिंता बढ़ाने वाले ही परिणाम सामने आ रहें हैं। 

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन को लेकर केंद्र सरकार द्वारा किसी प्रकार की कोई टिप्पणी अभी तक तो नहीं की गयी है यहाँ तक इस आंदोलन के बीच में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महाराष्ट्र का कई बार दौरा कर चुके हैं उसमें भी मराठा आरक्षण को लेकर कोई जिक्र नहीं किया है। इधर मराठा समाज आरक्षण को लेकर जिद पर अड़ा हुआ है वे किसी भी कीमत पर आरक्षण चाहते हैं। मराठा समाज आरक्षण लेने के लिए मुंबई आने के लिए पैदल निकल पड़ा है और 26 जनवरी को मुंबई पहुँच जाएगा। इस आंदोलन में मराठा समाज के कितने लोग शामिल होंगे इसका अनुमान सरकार को भी नहीं हैं माना जा रहा है इस आंदोलन में 50 lलाख के आसपास लोग मुंबई आएंगे , ऐसे में सरकार के लिए कानून व्यवस्था को बनाए रखना सबसे बड़ा चुनौतीपूर्ण काम होगा। 

मराठा नेता मनोज जरंगे पाटिल का कहना है कि सरकार ने उनसे वादा किया था जिसकी समय सीमा भी तय की गयी थी लेकिन उस तय सीमा में सरकार ने कुछ नहीं किया है , जरांगे का कहना है कि सरकार उन्हें मुर्ख बना रही है लेकिन ऐसा नहीं चलेगा। मनोज जरानगे का यह भी कहना है कि उन्होंने सरकार से बातचीत का रास्ता बंद नहीं किया है सरकार के लोग उनसे बातचीत करने के लिए आएंगे तो वे बातचीत करेंगे लेकिन अब किसी भी कीमत पर पीछे नहीं हटेंगे। मराठा आरक्षण को लेकर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का कहना है कि उनकी सरकार गंभीरता पूर्वक काम कर रही है इसलिए पिछड़ा वर्ग आयोग को सर्वेक्षण का काम दिया गया है उनकी सरकार मराठा समाज को स्थायी और कानून के दायरे में आरक्षण दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है और इसके लिए हर स्तर पर काम भी किए जा रहें हैं। 

महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन को लेकर विपक्ष हवा देने का काम कर रहा है , एनसीपी नेता शरद पवार इसे लेकर सरकार को घेर चुके हैं। विपक्ष का मानना है कि यदि लोकसभा चुनाव के पहले किसी वजह से मराठा आरक्षण लागू नहीं हो पाता है तो वे इसका राजनीतिक लाभ ले सकते हैं भाजपा किसी भी कीमत पर यह होने नहीं देना चाहती है क्योंकि इस बार के लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए महाराष्ट्र बेहद महत्वपूर्ण है , इसलिए महाराष्ट्र के भाजपा नेता लगातार यह बात कह रहें हैं कि मराठा समाज को नियम के अनुसार स्थायी आरक्षण दिया जाएगा लेकिन यहाँ पर सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि मराठा आंदोलनकारी सरकार की किसी भी बात पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं हैं। 

बगावत में उलझी महाराष्ट्र की राजनीति

   बगावत में उलझी महाराष्ट्र की राजनीति 

मनीष अस्थाना 
लगभग दो दशक पहले महाराष्ट्र की राजनीति में कांग्रेस का वर्चस्व हुआ करता था , लेकिन विदेशी मूल के मुद्दे पर शरद पवार ने कांग्रेस से बगावत कर अपनी अलग पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बना ली लेकिन जब शरद पवार को लगा कि वे अपने दम पर महाराष्ट्र में सरकार नहीं बना पाएंगे तब उन्होंने कांग्रेस पार्टी के साथ समझौता कर गठबंधन कर लिया और महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार भी बनाई और कांग्रेस के छोटे भाई की भूमिका में आ गए ।

  शिवसेना में भी पारिवारिक सत्ता संघर्ष की लड़ाई तेज हो गई जिसकी वजह से शिवसेना में बगावत करने की शुरुआत छगन भुजबल और नारायण राणे से शुरू हुई । छगन भुजबल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए और नारायण राणे ने कांग्रेस का दामन थाम लिया । उसके बाद शिवसेना से गणेश नाईक , संजय निरुपम जैस कई लोग अलग हो गए , यह सब उस समय हो रहा था जब बाल ठाकरे जीवित थे । शिवसेना में हुई इस बगावत का असर कुछ खास अधिक नहीं पड़ा उस समय बाल ठाकरे ने पार्टी को तो संभाल लिया, लेकिन पार्टी के बिखराव को रोक नहीं पाए , जब उन्होंने अपने जीते जी पार्टी की कमान अपने पुत्र उद्धव ठाकरे को सौपी तो इसके सबसे बड़े दावेदार यानि कि बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने शिवसेना से किनारा कर अपनी पार्टी महाराष्ट्र नव निर्माण सेना का गठन कर लिया , हालांकि राज ठाकरे महाराष्ट्र की राजनीति में कुछ कर नही पाए वे महाराष्ट्र की राजनीतिक सत्ता का हिस्सा तक बनने में कामयाब नही हो सके ।
1995 में शिवसेना और भाजपा महाराष्ट्र में सरकार बनाने में सफल हो गई थी इस बार शिवसेना ने विधानसभा की 73 सीटें जीती थी जबकि भाजपा 63 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी, राज्य में भाजपा शिवसेना सरकार बनने के बाद शिवसेना के भीतर आंतरिक मतभेद भी सामने आने लगे और पार्टी के दिग्गज नेता शिवसेना से बाहर जाने लगे जिसकी वजह से शिवसेना कमजोर हो गई। 1999 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना भाजपा मिलकर भी सरकार नहीं बना पायी। साल 2009 के विधानसभा चुनाव हुए और एक बार फिर कांग्रेस और एनसीपी ने महाराष्ट्र में सरकार बनाई। उस समय महाराष्ट्र में भाजपा छोटे भाई की भूमिका में थी लेकिन भाजपा की लगातार यही कोशिश रही कि वह बड़े भाई की भूमिका में आए । 2014 में भाजपा की यह इच्छा पूरी भी हो गई , मोदी की लहर के चलते भाजपा ने 122 सीटों पर जीत हासिल की और शिवसेना मात्र 63 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी। शिवसेना और भाजपा में गठबंधन होने की वजह से यह गठबंधन की सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा कर लिया। 2019 में शिवसेना - भाजपा गठबंधन ने फिर से जीत हासिल की इस बार भाजपा को 105 सीटों पर जीत हासिल हुई और शिवसेना मात्र 56 सीट ही जीत सकी। 
2019 के विधानसभा चुनाव में कम सीटें पाने के बावजूद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद शिवसेना को देने की मांग की , जिसे भाजपा के शीर्ष नेताओं ने ख़ारिज कर दिया। शिवसेना की मांग ख़ारिज किए जाने की मांग को उद्धव ठाकरे पचा नहीं पाए और भाजपा से अपना नाता तोड़ लिया। इसके बाद महाराष्ट्र में शिवसेना - राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी  तथा कांग्रेस ने मिलकर महाविकास आघाडी की स्थापना की जिसमें मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी उद्धव ठाकरे को दी गयी। एक समय ऐसा भी था जब शिवसेना भाजपा सरकार का रिमोट कंट्रोल मातो श्री में हुआ करता था लेकिन इस बार यह रिमोट कंट्रोल शरद पवार के हाथ में आ गया था ,इस तरह के गठबंधन को लेकर शिवसेना नेताओं में आंतरिक मतभेद था , हालांकि इस गठबंधन से शरद पवार की पार्टी एनसीपी में भी सब कुछ ठीक नहीं था शायद इसी लिए शरद पवार के भतीजे अजीत पवार ने बेहद गोपनीय तरीके से देवेंद्र फडणवीस के साथ मिलकर सरकार का गठन कर लिया और उपमुख्यमंत्री बन गए लेकिन अजित पवार उस वक्त एनसीपी के विधायकों को तोड़ने में कामयाब नहीं हो पाए थे, इसलिए उन्होंने अपना समर्थन वापस ले लिया और सरकार बहुमत साबित करने से पहले ही गिर गयी। यह टीस अजीत पवार के मन में घर कर गई ।
महाविकास आघाडी की सरकार ढाई साल तक किसी न किसी तरह से चलती रही लेकिन जून 2022 को अचानक शिवसेना से पार्टी के सबसे कद्दावर नेता एकनाथ शिंदे ने विद्रोह कर दिया , एकनाथ शिंदे ने जिस समय उद्धव ठाकरे से विद्रोह किया वे उस समय सरकार में कैबिनेट मंत्री थे , एकनाथ शिंदे ने सिर्फ विद्रोह ही नहीं किया बल्कि शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह पर भी अपना दावा ठोंक दिया। एकनाथ शिंदे ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना ली चुनाव चिन्ह भी हथिया लिया और पार्टी पर भी कब्ज़ा कर लिया। सरकार संवैधानिक है  या असंवैधानिक, इस बात की लड़ाई अभी चल रही है। उद्धव इस डैमेज कंट्रोल को सुधारने में लग गए तब तक उधर शरद पवार के भतीजे अजीत पवार भी इंतजार नहीं कर पाए , उन्होंने भी अपने चाचा शरद पवार से बगावत कर दी और एनसीपी के एक बड़े गुट को अपने साथ लेकर एकनाथ शिंदे - भाजपा की सरकार में शामिल हो गए। अजित पवार ने भी एनसीपी तथा चुनाव चिन्ह पर अपना दावा ठोक दिया और कहा कि उनका गुट ही असली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी है , हालांकि पार्टी पर अधिकार को लेकर चाचा भतीजे का संघर्ष चल रहा है। पिछले दो सालों से महाराष्ट की राजनीति बगावत में ही उलझ कर रह गयी है। 
पिछले कुछ समय से राजनीति के गलियारों में इस बात को लेकर चर्चा की जा रही है कि शिवसेना तथा एनसीपी में हुई बगावत का फायदा किसे मिलेगा ? स्वाभाविक है इसका राजनीतिक लाभ सबसे अधिक भाजपा को ही मिलेगा , क्योंकि कुछ समय के बाद लोकसभा चुनाव होने वाले है ऐसे में भाजपा को छोड़कर किसी भी पार्टी का संगठन मजबूत नहीं है। उद्धव ठाकरे अपने गुट वाली शिवसेना को मजबूत करने में लगे हुए हैं , एकनाथ शिंदे की हालत भी कुछ वैसी ही है एकनाथ शिंदे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सहारे अपनी राजनीतिक नौका पार लगाना चाहते है। शरद पवार की एनसीपी भी टूटकर पूरी तरह से बिखर चुकी है पार्टी का संगठनात्मक ढाँचा टूट चुका है जिसे इतनी जल्दी तो सुधारा नहीं जा सकता है। अजीत पवार वाले गुट की हालत भी कुछ वैसी ही है उनके पास भी अभी मजबूत संगठनात्मक ढांचा नहीं है ऐसे में चुनाव के समय परेशानी उठाना स्वाभाविक है , क्योंकि कार्यकर्ता अभी इस पशोपेश में है कि वह किसके साथ जाय ? कार्यकर्ता अभी तक तय नहीं कर पा रहा है वह दुविधा में फंसा हुआ है। 
ऐसे में यदि बात भाजपा की करें तो वह अन्य दलों की अपेक्षा काफी मजबूत स्थिति में है , जिस तरह से तीन राज्यों में चुनाव परिणाम आए हैं उसे देखने के बाद भाजपा में कोई भी बगावत का सुर नहीं अलापेगा चाहे उसका टिकट कटे या फिर मिले। क्योंकि तीन राज्यों में कई लोगों के टिकट शीर्ष नेताओं द्वारा काटे गए लेकिन एक दो अपवाद को छोड़कर किसी ने भी बगावत का झंडा बुलंद करने की हिम्मत नहीं दिखाई ठीक उसी तरह की स्थिति महाराष्ट्र में भी बनेगी चुनाव चाहे लोकसभा के हो या फिर विधानसभा के हो। भाजपा अपने नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक अपनी पकड़ मजबूत करने में लगी है। 

Sunday, January 11, 2015

राहुल गांधी के सामने संगठन मजबूत करने की सबसे बड़ी चुनौती


राहुल गांधी के सामने संगठन मजबूत करने की सबसे बड़ी चुनौती

किस तरीके से जीतेंगे अपने कार्यकर्ताओं का विश्वास

मनीष अस्थाना

      2014 के लोकसभा के चुनाव तथा महाराष्ट के विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपनी पार्टी के कोई करिश्मा नहीं दिखा पाये । लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र में हुये विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा । इसके बाद जितने भी प्रदेशों में चुनाव हुये वहाँ पर भी राहुल गांधी अपना कोई करिश्मा नहीं दिखा पाये । सीधे शब्दों में यदि कहा जाय तो नरेंद्र मोदी के सामने राहुल गांधी कहीं भी टिक नहीं पाये जिसकी वजह से कांग्रेस के गुब्बारे की हर जगह हवा निकल गयी । कई प्रदेशों में कांग्रेस की हवा निकलने के बाद कई लोगों ने राहुल गांधी को सीधे तौर पर जिम्मेदार माना जबकि कुछ चाटुकार लोगों ने राहुल गांधी का बचाव भी किया और कहा कि संगठन का कमजोर होना उनकी हार की प्रमुख वजह है ।

      वैसे देखा जाय तो कांग्रेस की हार की शुरुआत उत्तर प्रदेश में 2012 के विधानसभा से हो चुकी थी । उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जिस समय कांग्रेस की दुर्गति हुई थी उसके लिए संगठन को ही कमजोर माना गया था ,लेकिन कांग्रेसी नेताओं ने इससे कोई सबक नहीं लिया था उसके बाद न तो संगठन को मजबूत करने के कोई प्रयास किए गए और न ही कार्यकर्ताओं की समस्याओं को जानने का प्रयास किया था । उत्तर प्रदेश में पार्टी को मिली करारी हार के बाद जब कुछ निष्ठावान कांग्रेसी कार्यकर्ता राहुल गांधी से मिलने का प्रयास करते तो राहुल गांधी के इर्द गिर्द घूमने वाले लोग कार्यकर्ताओं से मिलने नहीं देते और न ही राहुल गांधी खुद कार्यकर्ताओ से सीधे मिलने में रुचि लेते जिसका परिणाम यह हुआ कि युवा कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का पार्टी से मोह भंग हो गया और पार्टी को अपने हाल पर छोड़ दिया । जिसका परिणाम यह हुआ कि लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस अपनी लंगोटी तक नहीं बचा सकी ।

      ठीक उत्तर प्रदेश के जैसी तस्वीर पिछले दिनों महाराष्ट्र में भी देखने को मिली । महाराष्ट्र में भी कांग्रेस पार्टी आंतरिक कलह से जूझ रही थी । बड़े नेताओं की गुटबाजी के कारण कार्यकर्ता इस ऊहा पोह में फंसा था कि वे किस गुट के साथ जाय लिहाजा कार्यकर्ताओं ने चुप रहने भी भलाई समझी । ऐसा भी नहीं कि इस बात की जानकारी राहुल गांधी को नहीं थी । नेताओं की गुटबाजी से राहुल गांधी को कई बार अवगत भी कराया गया । लेकिन हालात वही थे सामान्य कार्यकर्ता को न तो राहुल गांधी तक पहुँचने दिया जाता और न ही राहुल गांधी ऐसे किसी कार्यक्रम का आयोजन करते की कोई कार्यकर्ता सीधे अपनी बात उन तक पहुंचा सकता ,लिहाजा यहाँ भी नेताओं तथा कार्यकर्ताओं के बीच दूरियां बढ़ती चली गयी और युवा कार्यकर्ताओं का कांग्रेस पार्टी से मोह भंग हो गया जिसका परिणाम कांग्रेस को हार के रूप में उठाना पड़ा । हार से दुखी कांग्रेसी कार्यकर्ता बड़े नेताओं के साथ साथ राहुल गांधी के खिलाफ बोलने के लिए तैयार खड़ा है ।

      महाराष्ट्र में कांग्रेस को मिली हार के बाद पार्टी को मजबूत बनाने के लिए कोई ठोस निर्णय अभी तक नहीं लिए गए है इस बात का पता इसी बात से चलता है कि कांग्रेस ने प्रदेश स्तर पर कोई फेरबदल नहीं किया है महाराष्ट्र में प्रदेश अध्यक्ष भी वही है और प्रभारी भी वहीं है जिनकी वजह से पार्टी को बुरे दिन देखना पड़ा । सबसे मजेदार बात तो यह है जो कांग्रेसी नेता मोदी के एक सिपहसालार के सामने टिक भी नहीं पाते है उन्ही लोगों को संगठन को मजबूत करने की ज़िम्मेदारी फिर से सौपी गयी है । उत्तर प्रदेश ,मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र में कांग्रेस पार्टी को करारी शिकस्त दिलाने के बाद मोहन प्रकाश को मुंबई भेजा गया था । मोहन प्रकाश इस बात का पता लगाने के लिए आए थे कि अब मुंबई में कांग्रेस को किस तरीके मजबूत किया जा सकता है ?

      मुंबई के कांग्रेसी कार्यकताओं ने राहुल गांधी के उस निर्णय का विरोध किया जिसमें संगठनात्मक चुनाव कराने की प्रक्रिया शुरू की गयी थी । अधिकांश कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का कहना है कि पार्टी में पदाधिकारी का चुनाव नहीं चयन होना चाहिए । कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का कहना है कि राहुल गांधी ने अपने हिसाब से जितने भी निर्णय लिए उसमें पार्टी को नुकसान ही हुआ है लेकिन अब राहुल गांधी को कार्यकर्ताओं की सुननी होगी । हालांकि राहुल गांधी के लिए यह किसी चुनौती से कम नहीं होगा कि अपने द्वारा लिए गए किस तरीके से बदलेंगे । हालांकि इस समय जो चुनाव और चयन को लेकर जो विवाद कांग्रेस पार्टी में चल रहा है उसे देखते हुये ऐसा प्रतीत होता है कि राहुल गांधी के समक्ष संगठन को मजबूत करना किसी चुनौती से कम नहीं होगा ?

Tuesday, November 2, 2010

janch our ghotale

मनीष अस्थाना
इन दिनों मुंबई का आदर्श हाऊसिंग घोटाला व कामनवेल्थ घोटाला कांग्रेस सरकार की गले की हड्डी बने हुए है . इन मुद्दों पर कांग्रेसी नेता एक दुसरे के कपडे उतारने के काम मैं लगे हुए है सभी अपना दामन पाक साफ बताने का बताने में जुटे है लेकिन इन सभी के बीच पार्टी की खासी किरकिरी  हो रही है लिहाजा पार्टी की मुखिया सोनिया गाँधी ने सभी नेताओं को मीडिया से बात करने से मना कर दिया . मुंबई के आदर्श हौसिंग घोटाले में कई बड़े नेताओं के नाम सामने आये हैं जो लगातार सीएम के रेस में बने थे चाहे वे विलास राव देशमुख हो या फिर सुशिल कुमार सिंदे या फिर नारायण राणे का नाम हो . लेकिन इन सभी लोगों ने अपने आप को पाक साफ बताया है . हलाकि महारास्ट्र के सीएम ने अपना इस्तीफा पार्टी के प्रमुख सोनिया गाँधी को दे दिया है . पार्टी प्रमुख ने इस मामले पर एक जांच कमिटी गठित कर दी है माना जा रहा है की यह कमिटी अपनी रिपोर्ट कुछ समाया बाद सोपेगी जिसके बाद निर्णय लिया जायेगा .
इस बारें में जायदातर लोगों का मानना है की असोक चव्हाण का इस्तीफा स्वीकार कर लिया जायेगा इस्तीफा लेना भी चाइये

Monday, September 27, 2010

राम के सहारे राम मंदिर

मनीष अस्थाना
सदियाँ गुजर जाने के बाद अब राम जन्म भूमि के बारे में अदालत का निर्णय आने वाला है जिसको लेकर तमाम तरह की अटकलें लगायी जा रही हैं , किसी का कहना है की अदालत का निर्णय मुस्लिमो के पक्छ में जायेगा तो कुछ लोगों का यह मानना है की यह निर्णय हिन्दुओं के हक़ में हो सकता है इन्ही आशंकाओं को लेकर सरकार की नीद हराम हो चुकी है । सरकार को डर है की कही लोग आपस में लड़ने न लग जाएँ । वैसे सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिनों के लिए निर्णय तो टाल दिया है इससे सरकार को थोड़ी राहत तो जरुर मिली है , लेकिन इस मामले को अब ज्यादा खीचा नहीं जाना चाहिए । आने वाले निर्णय को लेकर कुछ कानून के जानकारों का कहना है इस मामले पर रोक नहीं लगनी चाहिये थी क्योंकि ज्यादातर लोग यही चाहते है की मामले का निपटारा अदालत करे क्योंकि यह मामला आपसी सहमती से हल नहीं किया जा सकता है , कानूनविदों का मानना है की लोग इसमें आपसी समझोता नहीं चाहते हैं यदि ऐसा होता तो यह मामला कब का हल हो गया होता ।
उधर राम मंदिर का मुद्दा धर्मवादी नेता अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहते हैं । इसीलिए यह लोग नहीं चाहते की इसका कोई हमेसा का हल निकले यदि एसा नहीं होता तो राम के नाम पर सत्ता में आने वाली बीजेपी आज राम मंदिर के मुद्दे को लेकर दूर जाती दिखाई दे रही है उसे लगने लगा है की यदि वह ऐसा करती है तो जो थोड़े बहुत मुसलमानों के वोट उसके पास हैं वे भी चलें जायेगे ।